Friday, December 25, 2009

थाईलैंड सरकार ने हिन्दू देवी-देवताओं पर डाक टिकट जारी किए

भारतीय संस्कृति का प्रभाव विदेशों में भी दिखने लगा है. हमारे देवी-देवता, हमारी भारतीय संस्कृति और भारतीय सभ्यता से जुड़ी हर चीज उन्हें आकर्षित करती है, प्राचीन भारतीय संस्कृति और सनातन परंपराओं के प्रति ज़बर्दस्त सम्मान दिखता है। इसका ज्वलंत उदाहरण है थाईलैंड सरकार द्वारा हिन्दू देवी-देवताओं पर जारी किए गए डाक टिकट।

थाईलैंड सरकार द्वारा हाल ही में हिन्दू देवी-देवताओं के चित्र वाले आठ डाक टिकट जारी किए गए हैं। इनमें भगवान गणेश, ब्रह्मा, भगवान नारायण(थाई भाषा में फ्रा नारय)और भगवान शिव(थाई भाषा में फ्रा इशुन)के चित्र हैं। डाक टिकट पर ब्रह्मा विष्णु महेश की त्रिमूर्ति के साथ ही ॐ भी बना हुआ है। इन देवी-देवताओं के चित्र भी उतने खूबसूरत हैं कि देखते ही मन मोह लेते हैं। भारतीय सनातन परंपरा के प्रतीक और देश के करोडों लोगो की आस्था और श्रध्दा के केंद्र इन देवी-देवताओं पर डाक टिकट जारी करके थाईलैंड सरकार ने वाकई एक सराहनीय कार्य किया है !!

Thursday, December 24, 2009

क्रिसमस पर्व की हार्दिक शुभकामनायें !!


*****क्रिसमस पर्व की हार्दिक शुभकामनायें*****

दूत बना डाकिया (डाकिया डाक लाया-6)

डाकिया यानी संदेशवाहक या दूत। संदेशों को शीघ्रता से इधर से उधर पहुंचाए। आज की हिन्दी में दूत शब्द का सीधा सीधा प्रयोग कम ही होता है मगर राजदूत शब्द भरपूर चलन में है और राजनयिक-वैदेशिक खबरों में इसका उल्लेख रहता है। गौरतलब है कि महाराष्ट्र और उड़ीसा में एक जातीय उपनाम है राऊत । यह राजदूत का ही अपभ्रंश है। राऊत मूलतः एक शासन द्वारा नियुक्त प्रतिनिधि होता था जो गांव में शासन के निर्देश पहुंचाने के अलावा लगान की वसूली भी करता था। दूत के अन्य पर्याय हैं हरकारा , डाकिया, संदेशहर, प्रतिनिधि आदि। दूत शब्द के मूल में हैं संस्कृत की दू,दु अथवा द्रु धातुए हैं जिनमें तीव्र गति का भाव शामिल है। द्रु का मतलब है भागना, बहना , हिलना-डुलना, गतिमान रहना आदि। द्रु से बना द्रावः जिससे हिन्दी में बना दौड़ या दौड़ना।
अब दु से बने दूत और द्रु से बने द्रुत शब्द पर गौर करें तो भाव दोनों का एक ही है। द्रुत का मतलब है तीव्रगामी, फुर्तीला, आशु गामी आदि। यही सारे गुण दूत में भी होने चाहिए। द्रा और द्राक् का मतलब भी तुरंत , तत्काल , फुर्ती से और दौड़ना ही होता है। जान प्लैट्स ने द्राक् से ही हिन्दी के डाक शब्द की व्युत्पत्ति मानी है । दूत के अर्थ में एक अन्य शब्द पायक या पायिकः भी है। यह भी पैदलसिपाही के अर्थ में है । पैदल तेज तेज भागना।
द्रु से ही बना है द्रव जिसका मतलब हुआ घोड़े की भांति भागनाया पिघलना, तरल, चाल, वेग आदि । द्रव का ही एक रूप धाव् जिसका मतलब है किसी की और बढ़ना, किसी के मुकाबले दौड़ना। मराठी में धाव का मतलब दौड़ना ही है। धाव् से बने धावक हुआ दौड़ाक यानी जिसका काम ही दौड़ना हो। जाहिर है यही तो प्राचीनकाल में दूत की प्रमुख योग्यता थी। द्रु के तरल धारा वाले रूप में जब शत् शब्द जुड़ता है तो बनता है शतद्रु अर्थात् सौ धाराएं। पंजाब की प्रमुख नदी का सतलज नाम इसी शतद्रु का अपभ्रंश है।
साभार : शब्दों का सफर

Tuesday, December 22, 2009

सहनशक्ति की चरम सीमा [डाकिया डाक लाया - 5]

वेनिस का मार्कोपोलो करीब सात सदी पहले कुबलाई खान का दरबारी था और उसके नोट्स के आधार पर मॉरिस कॉलिस ने मौले और पैलियट नामक पुस्तक लिखी। इस पुस्तक का हिन्दी अनुवाद श्री उदयकांत पाठक ने किया है। पेश है पोलो का दिलचस्प वृतांत- सन १२७१ के दौर में चीन के शासक कुबलाई खान की डाक व्यवस्था की अंतिम कड़ी।

संदेशवाहकों के पास सरकार की ओर से दी गई विशेष तख्तियां होती थीं इनके जोर पर वह रास्ते में खाकान के नाम पर जो चाहे पा सकता था। मसलन अगर उसका घोड़ा गिर पड़ता तो वह राह में मिलने वाले किसी भी व्यक्ति से यहां तक कि बड़े भारी सरदार से भी उसका घोड़ा ले लेता। यह था संदेशवाहकों का रुतबा और संदेश के महत्वपूर्ण होने का असर।इन संदेशवाहकों की सहनशक्ति की तुलना किसी भी सर्वाधिक शक्तिशाली आधुनिक मानक तोड़नेवाले से नहीं की जा सकती। जिस किसी को भी गुड़सवारी का अनुभव हो , वह बता सकता है कि पच्चीस मील घोड़े की सवारी कितनी थका देने वाली होती है । पूर्व में साधारण यात्री के लिए यह फासला एक दिन की मंजिल माना जाता है। पचास मील चल लेना बड़ी बात होती है और बार बार सवारी बदलकर भी सौ मील कर लेना औसत सवार की शक्ति से बाहर की चीज़ है । तब एक रात और दिन में चार सौ मील कैसे तय किया जा सकता है? इसका रहस्य स्टेपी मैदान के मंगोल सवार की थाती है। यह कभी नहीं कहा गया कि रोमन लोगों ने अपनी स़कों और चौकियों को इतनी अच्छी तरह संगठित कर रखा था कि वे अपने पररवाने इतनी जल्दी भेज सकते हों मानों उन्हें ले जाने के लिए उनके पास मोटरकार हो। फिर भी यह असादारण बात है कि मशीनी सवारियों के आविष्कार से पहले, ज़रूरत पड़ने पर आदमी इतनी ही तेजी से ले जाने वाली प्रणाली ढूंढ लेता था। आगे के वर्णन से यह पता चलता है कि किस तरह से अरब लोगों को दसवीं सदी में हवाई जहाज का पूर्वाभास हो गया था। फातिमा सम्प्रदाय के खलीफा अजीज ने जो काहिरा में रहता था , बालबेक से ताजी चेरियों की इच्छा व्यक्त की । बालबेक रेगिस्तान के पार चार सौ मील उत्तर में था । वहा के वजीर को जब इसकी खबर मिली तो उसने छह सौ पत्रवाहक कबूतर जमा किये और हर एक के पैर में एक चेरी रखकर थैली बंध दी। चेरियां काहिरा में बिल्कुल अच्छी हालत में उसी दिन खलीफा के भोज के वक्त पर पहुंच गईं।
साभार : शब्दों का सफर

Sunday, December 20, 2009

घोड़ों की टाप और परवाने (डाकिया डाक लाया-4)

पिछली कड़ी में हमने जाना कि किस तरह 1271 के दौर में चीन के मंगोल शासक कुबलाई खान ने डाक व्यवस्था के जबर्दस्त प्रबंध किए थे। उसी कड़ी में मार्को पोलो की डायरी से कुछ और जानकारी लेते हैं। गौरतलब है कि वेनिस का मार्कोपोलो इस कालखंड में कुबलाई खान का दरबारी था और उसके नोट्स के आधार पर मॉरिस कॉलिस ने मौले और पैलियट नामक पुस्तक लिखी। इस पुस्तक का हिन्दी अनुवाद श्री उदयकांत पाठक ने किया है। पेश है पोलो का दिलचस्प वृतांत-
चौबीस घंटों में चारसौ मील !
पीकिंग और प्रान्तीय शहरों के बीच सामान्य संदेशों के लिए पच्चीस मील दूर तक के स्थान का फासला वही संदेशवाहक रोज़ाना तय करता था। पच्चीस मील के हिसाब से एक संदेशवाहक लगभग दो महीने में दक्षिणी चीन पहुंचता है और बरमा की सीमा पर युन्नान को साढे तीन महीने में। किन्तु अति आवश्यक संदेशों को पहुचाने के लिए यह गति को ई इतनी तेज न थी। ज़रूरी संदेशवाहकों के लिए अलग व्यवस्था थी। चौकियों के मध्य सिर्फ तीन मील का फासला होता था। और उनके बीच भी छोटी चौकियां होती थीं जिनमें संदेशवाहक रहा करते थे। ये संदेशवाहक ज़रूरी संदेश ले जाते । प्रत्येक आदमी अगली चौकी तक तीन मील तय करता । यह फासला इतना ही होता कि वह आधे घंटे में तय कर लेता था ताकि अगली चौकी पर पहुचकर परवाना देने में देर न लगे। संदेशवाहक की कमर में घंटियां लगी रहतीं। ज्योंही घंटियां सुनाई पड़तीं, चौकी का मुंशी दूसरे धावक को तैयार कर देता । इस तरह सरकारी परवाना इस विशाल देश के एक छोर से दूसरे छोर तक धावकों की शृंखला द्वारा ले जाया जाता।
औसतन दिन रात दोनों में ही आठ मील प्रति गंटे का हिसाब रखा जाता जिससे दक्षिणी चीन में सप्ताह भर में तथा युन्नान में बारह दिन में पहुंचना संभव हो जाता। ऐसे अवसर भी होते जब इससे भी तेज पहंचना आवश्यक होता। तब इससे भी तेज गति की आवश्यकता होती। मसलन विद्रोह हो जाने की स्थिति में। मंगोलों ने इसके लिए भी व्यवस्थाएं की ताकि तेज गति सेसंदेश पहुंचाया जा सके जितनी जल्दी आज मोटर द्वारा पहुंचाया जाता है। तीन मील वाली चौकियों पर धावकों के अलावा कुछ घोड़े भी सवारों के साथ जीन कसे तैयार रहते थे। परवाना एक चौकी से दूसरी चौकी तक हर मुमकिन उस गति से भेजा जाता जिस अधिकतम गति पर घोड़े भाग सकते। घुड़सवार घंटियां साथ लेकर चलते ताकि घोड़ा बदलने में वक्त न लगे। रात दिन आदमियों को और घोड़ों को बदलते जाने के क्रम से परवाना चौबीस घंटों में चार सौ मील का फासला तय कर लेता था यानी करीब सातसौ किलोमीटर। यह दूरी और समय आज के ज़माने के हिसाब से भी कम नहीं है।
साभार- शब्दों का सफर

Saturday, December 19, 2009

क्या कहता है मार्को पोलो... (डाकिया डाक लाया-3)

डाक पर पिछली दो कड़ियों में हमने जानने का प्रयास किया कि डाक शब्द की व्युत्पत्ति का आधार क्या हो सकता है। इस संदर्भ मे द्राक् और ढौक शब्द सामने आए। अंग्रेजी के डॉक और बांग्ला के डाक से भी कुछ रिश्तेदारी सामने आई। द्राक् के शीघ्रता और दौड़ना जैसे मायनों और ढौक के पहुंचाना, पाना जैसे अर्थों के संदर्भ में पेश है कुछ और जानकारियां । वेनिस के मशहूर यात्री मार्को पोलो के बारे में मॉरिस कॉलिस की सुप्रसिद्ध पुस्तक मौले और पेलियट का अनुवाद श्री उदयकांत पाठक ने किया है । हिन्दी में यही पुस्तक मार्को पोलो के नाम से सन्मार्ग प्रकाशन ने छापी है। यहां उसी पुस्तक के कुछ अंश दिए जा रहे हैं जिनसे प्राचीन डाक व्यवस्था के बारे में ठोस जानकारियां मिलती हैं। सन् 1271 में मार्कोपोलो अपने पिता और चाचा के साथ चीन रवाना हुआ। उनका सफर सिल्क रूट पर तय हुआ। पोलो तब पंद्रह बरस का था। साढे तीन साल में यह सफर पूरा हुआ। पोलो को चीन के महान मंगोल शासक कुबलाई खान के शासन में सिविल सर्विस में काम करने का मौका मिला । करीब दो दशक तक वह वहां रहा। उसके नोट्स के आधार पर ही उक्त पुस्तक लिखी गई है। इस दिलचस्प विवरण की पहली कड़ी का आनंद लें।

तीन लाख घोडे, दस हजार चौकियां
कुबलाई खान भी रोमनों की तरह साम्राज्य पर नियंत्रण के लिए सड़कों के महत्व को जानता था।राजधानी पीकिंग को इन तमाम स्थानों से जोड़ने के लिए उसने सुदूर इरान और रूस तक सड़को का जाल बिछाया। मंगोलों की मार्ग प्रणाली, उस पर स्थित सरायें, फौजी चौकियां, डाक के घोड़े और थके घोड़ों के बदले नए घोड़े लेना इन सबका इतना अधिक विकास हुआ कि यह सारे शासन का ही एक महत्वपूर्ण विषय बन गया । इन मुख्य उद्देश्यों में से एक यह भी था कि
चीनियों तथा अन्य विजित राष्ट्रों को नियंत्रण में रखा जाए। पोलो इस विषय संबंधी कुछ मनोरंजक विवरण देता है। उसने समूचे चीन में बहुत यात्राएं की थी और वह मार्गों से खूब परिचित था। कुछ स्थानों पर ये मार्ग पहियेदार गाड़ियों के लिए बने थे किन्तु सामान्य घुड़सवारों के लिए उनके अनुरूप मिट्टी की सड़कें थीं। हर पच्चीस मील पर सरकारी चौकी रहती थी जो
यात्रा करनेवाले अफसरों और संदेशवाहकों के लिए सुरक्षित रहती थी। इस इमारत में बढ़िया रेशमी बिस्तर और अन्य आवश्यक चीज़ें भी रहती थीं।

इनमें से प्रत्येक चौकी में एक अस्तबल रहता था जिसमें सरकारी संदेशवाहकों के लिए घोड़े तैयार रहते थे। जिन रास्तों पर शाही डाक बहुत चलती थी उन पर चारसौ घोड़े तक सुरक्षित रखे जाते थे। दूरवर्ती मार्गों पर यह संख्या कम होती और चौकियों के बीच दूरी भी ज्यादा रहती। पोलो अपने विवरण में इन तमाम घोड़ों की संख्या तीन लाख और चौकियों की संख्या दस हजार बताता है। और इस भय से कि उसकी बात पर शायद भरोसा न किया जाए - क्योंकि मंगोल साम्राज्य की विस्तृत दूरियां और विशालता उसके भूमध्यसागरीय पाठकों की कल्पना से परे थीं - वह जोर देकर कहता है कि यह सब व्यवस्था इतने आश्चर्यजनक पैमाने पर और इतनी व्ययसाध्य थी कि उसका वर्णन कठिन है।
साभार- शब्दों का सफर

Friday, December 18, 2009

डाकिया डाक लाया- 2

मेरे ख्याल से पोस्टऑफिस का अनुवाद 'डाकघर' गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर का किया हुआ है, जिनकीएक कविता की पंक्ति है-'जोदि तोमार डाक शुने केऊ ना आशे तोबे ऐक्ला चालोऐक्ला चालो ऐक्ला चालो रे...।' यहां डाक का सपाट अर्थ 'पुकार' है और डाकघर, डाकिया आदि शब्द इसी के व्युत्पन्न हैं। डाकिए या संदेशवाहक केलिए संस्कृत और पुरानी हिंदी का शब्द पायक है, जिसका द्रा धातु से कोई संबंध नहीं.(पहलू वाले चंद्रभूषण जी)

डाकिये की पुकार और डाक की रफ्तार
बेशक, गुरूदेव वाला, बांग्ला वाला संदर्भ सही हो सकता है। डाक के 'पुकार' अर्थ में अगर डाकिये को देखें तो यह बात नज़र भी आती है। संदेश-संवाद लाने के बाद उसे हांक लगाकर सुनाने या संदेश पाने वाले का नाम पुकारने वाले के तौर पर डाक से डाकिया शब्द चल पड़ा होगा। मगर बांग्ला डाक की व्युत्पत्ति क्या हो सकती है ? पोस्टआफिस के अर्थ में डाकघर अनुवाद गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर का किया हुआ माना जा सकता है मगर डाक में खाना लगाकर उर्दू का जो डाकखाना बना वह चलन कब का है ? ( ये अलग बात है कि उर्दू में ड वर्ण ही नहीं है। ) गुरूदेव द्वारा पोस्ट आफिस को डाकघर नाम देने से दशकों पहले से डाक शब्द अंग्रेजीराज में दाखिल हो चुका था। जाहिर है कि डाकखाना भी डाकघर से पहले बन चुका होगा । एक और बात है। बांग्ला के डाक ( पुकार ) शब्द में कहीं भी संवाद या संदेश जैसा अर्थ ध्वनित नहीं हो रहा है। खासतौर पर चिट्ठी-पत्री या दस्तावेज़ी संदेश जैसी बात तो कतई नहीं। यही बात द्राक् के बारे में भी कही जा सकती है। मगर संदेश पहुंचाने की प्रणाली के संदर्भ में द्राक का रिश्ता जुड़ता हुआ लग रहा है।

रही बात पायक की सो संस्कृत में इसका रूप पायिकः है जो हिन्दी में पायक हो गया। संस्कृत में संदेश वाहक नहीं बल्कि पैदल सिपाही के तौर पर इसका अर्थ बताया गया है (आपटे कोश) और ज्ञानमंडल हिन्दी कोश में भी इसका अर्थ पैदल सिपाही, सेवक या दूत बताया गया है। संदेशवाहक की प्रकृति पर अगर ध्यान दें तो पायक की व्युत्पत्ति चाहे द्रा से न जुड़ती हो मगर प्रकृति एक ही है। पायक पैदल चलने वाला है और द्रा या द्राक् में शीघ्रता है। दोनों में ही गति तो है। दस्तावेज़ी संदेश के अर्थ में पुकार वाले भाव का डाक से रिश्ता थोड़ा पीछे जुड़ता हुआ लगता है बनिस्बत द्राक् या पायक में निहित गति या शीघ्रता वाले भाव के । आपटे के कोश में एक और भी शब्द है - ढौक् जिसका अर्थ है जाना, पहुंचाना,निकट लाना या प्रस्तुत करना । ये तमाम भाव भी डाक में निहित संदेश वाले अर्थ से जुड़ते हैं न कि पुकार वाले अर्थ से। अर्थसाम्य और ध्वनिसाम्य व्युत्पत्ति तलाशने वालों के प्रिय उपकरण रहे हैं और यहां ये दोनों ही काम दे रहे हैं।
साभार : शब्दों का सफर

Thursday, December 17, 2009

डाकिया डाक लाया -1

...कहता हूं दौड़ दौड़ के कासिद से राह में
डाक आमफहम हिन्दोस्तानी ज़बान का एक ऐसा लफ्ज है जिसके साथ समाज के हर वर्ग की भावनाएं जुड़ी हुई हैं। डाक एक संवाद है अपनों से जो दूर बसे हैं। सुख,दुख के संवाद का जरिया। डाक यानी चिट्ठी-पत्री, पोस्ट। कहां से आया ये लफ्ज ? दरअसल यह शब्द संचार माध्यम की अत्यंत प्राचीन सरकारी व्यवस्था से भी जुड़ा हुआ है।

चिट्ठी-पत्री यानी डाक शब्द के साथ जो बात सबसे महत्वपूर्ण है वह है इसे पाने की भी जल्दी रहती है और भेजने की भी। एक शायर लिखते हैं - आती है बात बात मुझे याद बार बार / कहता हूं दौड़ दौड़ के कासिद से राह में । और दूसरी तरफ - दे भी जवाबे ख़त कि न दे , क्या ख़बर मुझे / क्यों अपने साथ ले न गया , नामाबर मुझे । मतलब यही कि शीघ्रता का जो भाव डाक के साथ जुड़ा है उसी में है इसके जन्म का मूल भी।

संस्कृत का एक शब्द है द्रा जिसके मायने हैं दौड़ना, शीघ्रता करना , उड़ना आदि। इसी से बना है द्राक् जिसका मतलब होता है जल्दी से , शीघ्रता से , तुरन्त, तत्काल, उसी समय वगैरह वगैरह। इसे ही डाक का उद्गम माना गया है। गौर करें कि प्राचीनकाल की संचारप्रणाली में जो अच्छे धावकों को ही संदेशवाहक का काम सौंपा जाता था। ये रिले धावकों की तरह निरंतर एक स्थान से दूसरे स्थान तक संदेश पहुंचाने तक भागते रहते थे। थोड़ी थोड़ी दूरी पर इन्हें बदल दिया जाता था। ये प्रणाली बड़ी कारगर थी और दुनिया के हर हिस्से में यही तरीका था संदेश पहुंचाने का।

अंग्रेजी दौर में फली-फूली
अंग्रेजी शासन व्यवस्था में यह शब्द खूब इस्तेमाल हुआ है। इसका रिश्ता जहाज के ठहरने के स्थान से भी जोड़ा जाता है जिसे डॉक कहते हैं। लंदन से राजशाही के कामकाज की चिट्ठियां भारतीय गवर्नर के नाम जहाजों से ही आती थीं। डॉक शब्द बना है पोस्टजर्मनिक के डोको से जिसका मतलब बंडल भी होता है।

भारत के लंबे चौडे शासनतंत्र को सुचारू रूप से चलाने में अंग्रेजों की चाक चौबंद डाक प्रणाली का बड़ा योगदान रहा। डाकखाना, डाकबंगला, डाकिया, डाकघर जैसे शब्द यही ज़ाहिर करते हैं। पुराने ज़माने के धावकों की जगह कालांतर में घुड़सवार संदेशवाहकों ने ले ली। अंग्रेजों ने बाकायदा इसके लिए घोड़ागाड़ियां चलवाईं जिन्हें डाकगाड़ी कहा जाता था। आज इन्हीं डाकगाड़ियों की जगह लालरंग की मोटरों ने ले ली है जिन्हें डाक विभाग चलाता है।
साभार- शब्दों का सफर

Sunday, December 13, 2009

अब डाकिया चिठ्ठी नहीं लाता ???

अब चिठ्ठी नहीं आती ! कॉलेज में था - बाबा का चिठ्ठी आता था , माँ और बहन का भी आता था ! चिठ्ठी मिलते ही - कई बार पढ़ता था - घर से दूर था ! फिर चिठ्ठी को तकिया के नीचे या सिरहाने के नीचे रख देता - फिर कभी मौका मिलता तो दुबारा पढ़ लेता ! बाबू जी को चिठ्ठी लिखने की आदत नहीं थी सो वो केवल पैसा ही भेजते थे ! किसी दिन डाकिये ने अगर किसी दोस्त का चिठ्ठी हमें पकडा देता तो हम दोस्त को खोज उसको चिठ्ठी सौंप देते ! बड़ा ही सकून मिलता !
मुझे चिठ्ठी लिखने की आदत हो गयी थी - लम्बा लम्बा और भावनात्मक ! बाबा , दादी , माँ - बाबू जी , बहन सब को लिखा करता था ! और फिर कई सप्ताह तक चिठ्ठी का इंतज़ार ! धीरे धीरे चिठ्ठी की जगह बाबू जी के द्वारा भेजे हुए "ड्राफ्ट" का इंतज़ार होने लगा ! और फोन भी थोडा सस्ता होने लगा ! अब धीरे धीरे बाबू जी को फ़ोन करने लगा - END MONEY - SEND MONEY !
कभी प्रेम पत्र नहीं लिखा - आज तक अफ़सोस है ! पर शादी ठीक होने के बाद - पत्नी को पत्र लिखा - जिन्दगी की कल्पना थी - अब हकीकत कितना दूर है !
अब ईमेल आता है - अनजान लोगों का ! जिनसे कभी मिला नहीं - कभी जाना नहीं - जबरदस्ती का एक रिश्ता - जिसमे खुशबू नहीं , कोई इंतज़ार नहीं ! फ़ोन पर कई बार दिल की बात नहीं कह पाते हैं लोग फिर क्यों न चिठ्ठी का सहारा लिया जाए !

रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !
(साभार-दालान)

Sunday, November 15, 2009

"राजस्थान पत्रिका" में ब्लॉग की चर्चा

"डाकिया डाक लाया" ब्लॉग की चर्चा सबसे पहले 8 अप्रैल, 2009 को दैनिक हिंदुस्तान अख़बार में ब्लॉग वार्ता के अंतर्गत की गई थी। रवीश कुमार जी ने इसे बेहद रोचक रूप में प्रस्तुत किया था. इसके बाद इसकी चर्चा 29 अप्रैल 2009 के दैनिक 'राष्ट्रीय सहारा' पत्र के परिशिष्ट 'आधी दुनिया' में 'बिन्दास ब्लाग' के तहत की गई. "प्रिंट मीडिया पर ब्लॉग चर्चा" द्वारा पता चला कि अब इस ब्लॉग की २२ अक्तूबर की पोस्ट "2009 ईसा पूर्व में लिखा गया दुनिया का पहला पत्र'' की चर्चा 11 नवम्बर 2009 को राजस्थान पत्रिका, जयपुर संस्करण के नियमित स्तंभ 'ब्लॉग चंक' में की गई है....ऐसे में यह जानकर अच्छा लगता है कि इस ब्लॉग को आप सभी का भरपूर प्यार व सहयोग मिल रहा है. आप सभी शुभेच्छुओं का आभार !!

Thursday, October 22, 2009

2009 ईसा पूर्व में लिखा गया दुनिया का पहला पत्र

हममें से हर किसी ने अपने जीवन में किसी न किसी रूप में पत्र लिखा होगा। पत्रों का अपना एक भरा-पूरा संसार है। दुनिया की तमाम मशहूर शख्सियतों ने पत्र लिखे हैं- फिर चाहे वह नेपोलियन हों, अब्राहम लिंकन, क्रामवेल, बिस्मार्क या बर्नाड शा हों। महात्मा गाँधी तो रोज पत्र लिखा करते थे. अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा को आज भी रोज ४०,०० से ज्यादा पत्र प्राप्त होते हैं.आज ये पत्र एक धरोहर बन चुके हैं। ऐसे में यह जानना अचरज भरा लगेगा कि दुनिया का सबसे पुराना पत्र बेबीलोन के खंडहरों से मिला था, जो कि मूलत: एक प्रेम-पत्र था. बेबीलोन की किसी युवती का प्रेमी अपनी भावनाओं को समेटकर उससे जब अपने दिल की बात कहने बेबीलोन तक पहुँचा तो वह युवती तब तक वहां से जा चुकी थी। वह प्रेमी युवक अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाया और उसने वहीं मिट्टी के फर्श पर खोदते हुए लिखा- ''मैं तुमसे मिलने आया था, तुम नहीं मिली।'' यह छोटा सा संदेश विरह की जिस भावना से लिखा गया था, उसमें कितनी तड़प शामिल थी। इसका अंदाजा सिर्फ वह युवती ही लगा सकती थी जिसके लिये इसे लिखा गया। भावनाओं से ओत-प्रोत यह पत्र 2009 ईसा पूर्व का है और आज हम वर्ष 2009 में जी रहे हैं. ...तो आइये पत्रों के इस सफर का स्वागत करते हैं और अपने किसी को एक खूबसूरत पत्र लिखते हैं !!

Monday, October 12, 2009

यादगार के तौर पर चिट्ठियाँ

21वीं सदी में संचार माध्यमों की बढ़ती उपयोगिता ने बहुत सारी चीजों को प्रभावित किया है। जाहिर है कि मोबाइल के आने के बाद से हिंदी साहित्य में जिस विधा का अस्तित्व लगभग समाप्त हो चला है वह पत्र है। हर नये साल की शुरूआत में जब भी साहित्यिक पत्र पत्रिकाओं में लेखा-जोखा प्रकाशित होता है तो उसमें कहानी, कविता, उपन्यास विषयों में तो पुस्तकों की भरमार होती है लेकिन पत्र, संस्मरण, साक्षात्कार, आत्मकथा की पुस्तकों की संख्या इस कदर कम होती है कि उसे उंगलियों पर गिना जा सकता है। संचार माध्यमों के विशेषकर मोबाइल के आम आदमी के हाथों में पहुँचने से पहले की बात की जाए तो निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि अपने सुख और दुःख व्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम हमारे समाज में चिट्ठियां रही हैं। एक समय में परिवार से दूर रह रहा व्यक्ति अपनी पत्नी और पुत्र-पुत्रियों से चिट्ठियों के माध्यम से संवाद कायम किया करता था।

आधुनिक भारत के निर्माता पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा अपनी बेटी इंदिरा गांधी को लिखी गई चिट्ठियों की चर्चा आज भी की जाती है। चिट्ठी आज भी संवाद भावनाओं को व्यक्त करने का सशक्त जरिया मानी जाती है। आज भी मेरे पास माँ की लिखी गई चिट्ठियां हैं जो सिर्फ परिवार तक सीमित न होकर गाँव जंवार और बाग बगीचों को भी खबर देने वाली रही हैं। इस बीच मोबाइल का आगमन क्या हुआ कि लोग बेहद कम कीमत पर दूर बैठे अपने परिजनों से बातचीत करने लगे लेकिन इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि धीरे-धीरे पूरा समाज चिट्ठियां लिखने और भेजने से कतराने लगा। एक समय आज से करीब 20 साल पहले पोस्टमैन की आवाज सुनने के लिए गाँव की स्त्रियां और पुरूष बाट जोहते थे। पोस्टमैन न सिर्फ चिट्ठियां लाता था बल्कि मनीआर्डर और नौकरी की खबर भी। यह सच भी है कि जब हम 30 सेकेंड के भीतर ही अपने प्रियजनों की सुमधुर आवाज सुन सकते हैं तो चिट्ठी लिखकर पोस्ट आफिस में डालने और उसका जवाब आने का इंतजार कौन करे? एक समय में कबूतर भी चिट्ठियां ले जाने का काम किया करते थे और कई फिल्मों में ऐसे दृश्य दिखाए भी गए हैं जिसमें कबूतर पत्र लिखने वाले की प्रेमिका को उसके जज्बातों से लबरेज चिट्ठी पहुँचा दिया करता था। आज से पहले किसी बड़े कथाकार की एक कहानी छपने पर सौ दो सौ पत्र आते थे जबकि आज वे एक पोस्टकार्ड के लिए तरसते हैं। जाहिर है कि यह ई-मेल, मोबाइल, एसएमएस के आगमन के कारण हुआ है। इसके बावजूद हमें मौका मिलने पर परिजनों को चिट्ठियां लिखना चाहिए क्योंकि ऐसी चिट्ठियां यादगार के तौर पर भी रखी जा सकती हैं। इस तरह हम एक मरती हुई विधा को बचा सकेंगे।

(साभार: इण्डिया न्यूज, 3-9 अक्टूबर, 09 में अशोक मिश्र)

Sunday, October 11, 2009

Gandhiji writes a postcard प्रतियोगिता का आयोजन

गांधी जी को पत्रों से बहुत प्यार था। वे अक्सर अपने साथ पोस्टकार्ड लेकर चलते थे और जहाँ भी रूकते थे, लोगों को पोस्टकार्ड लिखा करते थे। डाक विभाग राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी की इस खासियत के मद्देनजर राष्ट्रीय स्तर पर 'Gandhiji writes a postcard' प्रतियोगिता आयोजित कर रहा है। इसके अन्तर्गत बच्चे प्रतियोगिता पोस्टकार्ड पर एक पत्र लिखेंगे। इस हेतु वह अपने को गांधी जी मानकर पत्र लिखेंगे और यह पत्र किसी ज्वलंत तात्कालिक मुद्दे पर होना चाहिए।

प्रतियोगिता दो श्रेणियों में होगी। प्रथम, कक्षा 3 से कक्षा 5 तक और द्वितीय, कक्षा 6 से कक्षा 8 तक। इस हेतु किसी भी प्रकार का प्रवेश शुल्क नहीं देना होगा। मात्र 10 रूपये का प्रतियोगिता पोस्टकार्ड डाकघर से खरीद कर, उस पर हाथ से निबंध लिखना होगा। निबंध हिन्दी/अंग्रेजी में लिखा जा सकता है। शब्द सीमा न्यूनतम 25 शब्दों की होगी। इसके साथ प्रेषक अपना नाम, उम्र, कक्षा, स्कूल, पता व निबंध लेखन की तिथि, प्रतियोगिता पोस्टकार्ड के पीछे पते वाले भाग के बगल में लिखेगा। निबंध लिखकर पोस्टकार्ड को चीफ पोस्टमास्टर जनरल के चिन्हित पोस्ट बाक्स (उत्तर प्रदेश हेतु-पोस्ट बाक्स सं0-101,लखनऊ जी0पी0ओ0) के पते पर भेजना होगा। इस हेतु अंतिम तिथि 30 अक्टूबर 2009 है। राष्ट्रीय स्तर पर एक जनवरी 2010 को रिजल्ट घोषित कर दिये जायेंगे।

सर्वश्रेष्ठ निबंध को पुरस्कृत भी किया जायेगा। परिमण्डलीय स्तर पर प्रथम श्रेणी (कक्षा 3-5) हेतु क्रमशः आईपाड, डिजिटल कैमरा व सी0डी0 के साथ इन्साइक्लोपीडिया सेट एवं द्वितीय श्रेणी (कक्षा 6-8) हेतु क्रमशः लैपटाप, आईपाड व डिजिटल कैमरा क्रमशः प्रथम, द्वितीय व तृतीय पुरस्कार के रूप में दिये जायेंगे। इसी प्रकार राष्ट्रीय स्तर पर प्रथम श्रेणी (कक्षा 3-5) हेतु लैपटाप व सी0डी0, डिजिटल कैमरा एवं सिन्थसाइजर तथा द्वितीय श्रेणी (कक्षा 6-8) हेतु पर्सनल कम्प्यूटर, प्रिन्टर, यू0पी0एस0 व सी0डी0, हैण्डीकैम तथा म्यूजिक सिस्टम क्रमशः प्रथम, द्वितीय व तृतीय पुरस्कार के रूप में दिये जायेंगे।

Saturday, October 10, 2009

डाकिया बाबू बनवाएगा मूल्य सूचकांक

डाकिया बाबू अब राष्ट्रीय स्तर पर सटीक वास्तविक मूल्य सूचकांक तैयार करने में भी सहयोग करेगा। केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन ने इस कार्य के लिए डाक विभाग के देशव्यापी नेटवर्क का इस्तेमाल करने के लिए 25 फरवरी, 2009 को अनुबंध किया, जिसके तारतम्य में डाटा-एकत्रीकरण का कार्य डाकिया द्वारा किया जा रहा है। अनुबंध के अनुसार डाक विभाग देश भर के ग्रामीण क्षेत्रों से चयनित 1183 डाकघरों के माध्यम से उपभोक्ता वस्तुओं के मूल्यों का संकलन कर रहा है। इसके तहत ग्रामीण क्षेत्र में डाकियों के माध्यम से दो तरह के सर्वेक्षण कराये जा रहे हैं। प्रथम, जन वितरण प्रणाली के तहत प्रदान किये जाने वाले चावल, गेहूँ, गेहूँ का आटा, चीनी और केरोसीन के बी0पी0एल0 व अन्त्योदय ग्राहकांे को दिये जाने वाले मूल्यों का सर्वेक्षण। द्वितीयतः, निर्धारित गाँवों में लगने वाले बाजारों व दुकानों पर बिकने वाले सामानों के मूल्यों का सर्वेक्षण। इसमें लगभग 200 वस्तुएं शामिल हैं, मसलन अन्न एवं उसके उत्पाद, दालें, दूध एवं उसके उत्पाद, तेल एवं बसा, मीट एवं मछली, चावल, गेहूँ, मैदा, सूजी, मक्का, सब्जियों, फल, शकर एवं शहद, मसाले, चाय एवं काफी, तैयार भोजन, पान सुपाड़ी तम्बाकू, ईधन एवं प्रकाश, पहनने वाले वस्त्र एवं बिस्तर, जूते, शिक्षा इत्यादि, स्वास्थ्य क्षेत्र, मनोरंजन एवं खेलकूद, परिवहन एवं संचार, निज कार्य हेतु सामग्री, गृहस्थी के सामान इत्यादि। इसके तहत हर माह के आंकड़े लगभग 31 पेजों में भरकर एकत्र किये जाने डाकिया बाबू द्वारा एकत्र की गई इन जानकारियों को केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन की वेबसाइट पर डाकघरों द्वारा ही फीड कर दिया जा रहा है।

डाकिया बाबू द्वारा एकत्रित जरूरी उपभोक्ता वस्तुओं के दामों का विवरण हर माह डाक विभाग द्वारा केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन को उपलब्ध कराया जाता है। कहा जा रहा है कि संगठन अब इसी आधार पर वास्तविक मूल्य सूचकांक तैयार करेगा और यह सूचकांक ही सरकारी कार्य योजनाओं का आधार बनेगा। गौरतलब है कि इधर उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (कन्ज्यूमर प्राइज इण्डेक्स) में मूल्य वृद्धि शून्य होने के बावजूद बाजार में सामानों के दाम काफी बढ़े नजर आ रहे हैं। ऐसे में जानकारों का मानना है कि वर्तमान में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक मेट्रो व अन्य चुनिंदा शहरों के दामों के आधार पर तैयार किये जाते रहे हैं। अब ग्रामीण क्षेत्रों के खुदरा मूल्य को आधार बनाने के कारण मूल्य सूचकांक को वास्तविक बनाया जा सकेगा।

Friday, October 9, 2009

चिट्ठी में भी आ सकते हैं बम

अचानक नजर एक खबर पर आकर अटक गई। शीर्षक था- चिट्ठी में भी आ सकते हैं बम। लोग तो बाद में डरेंगे, पहले तो मुझे ही डरना था आखिर रोजमर्रा का मेरा काम ही चिट्ठियों को लाना और ले जाना है। खबर कुछ यूँ थी- ‘‘अपनों का कुशल मंगल बताने वाली चिट्ठी भी अमंगल का कारण बन सकती है। इन पर अब आतंकियों की नजर हैं। सितंबर (9/11) बीत चुका है लेकिन नवंबर (11/26) नजदीक है। ऐसे में पूरी दुनिया आतंकी हमलों को लेकर चैकस है। हाल में अमेरिका और यूरोप की बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपने भारतीय प्रबंधन को खास निर्देश दिए हैं, जिसमें कहा गया है कि कोई भी कर्मचारी कार्यालय के पते पर व्यक्तिगत पत्र, पार्सल या कूरियर नहीं मंगवाएगा। सुरक्षा एजेंसियों के खुलासों के बाद कंपनियों को खतरा है कि चिट्ठियों के जरिए आतंकी विस्फोटक भेज सकते हैं। नोएडा में इंग्लैंड की एक कंपनी के मानव संसाधन विभाग ने अपने कर्मचारियों को आदेश दिया है कि व्यक्तिगत पत्र व्यवहार कार्यालय के पते पर नहीं करें। ऐसे पत्र, पार्सल और कूरियर के लिए अपने घर का पता इस्तेमाल करें। वस्तुतः बहुराष्ट्रीय कंपनियों में 90 फीसदी से ज्यादा कर्मचारी भारतीय हैं। विदेशी कर्मचारियों के लिए आने वाले पत्रों की जांच हवाई अड्डों पर हो जाती है। लेकिन स्थानीय पत्रों की जांच नहीं होती।‘‘

....... आपको वह दिन तो याद होंगे जब चिट्ठियों के माध्यम से एन्थ्रेक्स को फैलाये जाने की अफवाहें हर तरफ थीं। कानपुर में तो एक बार एक व्यक्ति ने लगभग सैकड़ा चिट्ठियाँ तमाम अधिकारियों-नेताओं को भेज दी और उनमें कुछ बारूदनुमा पदार्थ था। वास्तव में यह क्या था, यह तो नहीं पता चला पर चिट्ठी जरूर बदनाम हो गई। मेरी आप सबसे यही गुजारिश है कि चिट्ठियां लोगों की संवेदनाओं से जुड़ीं होतीं हैं और कृपा करके उन्हें विस्फोटक मत बनाइये।

Thursday, October 8, 2009

विश्व डाक दिवस की बधाईयाँ !!

डाक सेवाओं की एक पुरानी परम्परा है। दुनिया भर में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं होगा, जिसका कभी डाक सेवाओं से पाला न पड़ा हो। यह अचरज की बात है कि एक देश में पोस्ट किया हुआ पत्र दुनिया के दूसरे कोनों में आराम से पहुँच जाता है। डाक सेवाओं के संगठन रूप में उद्भव के साथ ही इस बात की जरूरत महसूस की गई कि दुनिया भर में एक ऐसा संगठन होना चाहिए, जो यह सुनिश्चित करे कि सभी देशों के मध्य पत्रों का आवागमन सहज रूप में हो सके और आवश्यकतानुसार इसके लिए नियम-कानून बनाये जा सकें।

इसी क्रम में 9 अक्टूबर 1874 को ‘‘जनरल पोस्टल यूनियन‘‘ के गठन हेतु बर्न, स्विटजरलैण्ड में 22 देशों ने एक संधि पर हस्ताक्षर किया था, इसी कारण 9 अक्टूबर को कालान्तर में ‘‘विश्व डाक दिवस‘‘ के रूप में मनाना आरम्भ किया गया। यह संधि 1 जुलाई 1875 को अस्तित्व में आयी, जिसके तहत विभिन्न देशों के मध्य डाक का आदान-प्रदान करने संबंधी रेगुलेसन्स शामिल थे। कालान्तर में 1 अप्रैल 1879 को जनरल पोस्टल यूनियन का नाम परिवर्तित कर यूनीवर्सल पोस्टल यूनियन कर दिया गया। यूनीवर्सल पोस्टल यूनियन का सदस्य बनने वाला भारत प्रथम एशियाई राष्ट्र था, जो कि 1 जुलाई 1876 को इसका सदस्य बना। जनसंख्या और अन्तर्राष्ट्रीय मेल ट्रैफिक के आधार पर उस समय सदस्य राष्ट्रों की 6 श्रेणियां थीं और भारत आरम्भ से ही प्रथम श्रेणी का सदस्य रहा। 1947 में यूनीवर्सल पोस्टल यूनियन, संयुक्त राष्ट्र संघ की एक विशिष्ट एजेंसी बन गई। यह भी एक रोचक तथ्य है कि विश्व डाक संघ के गठन से पूर्व दुनिया में एकमात्र अन्तर्राष्ट्रीय संगठन रेड क्रास सोसाइटी (1870) था।

यह भी एक अजीब इत्तिफाक है कि 1874 में ‘‘जनरल पोस्टल यूनियन‘‘ के गठन के ठीक अगले साल 1975 में भारतीय डाक पर प्रथम पुस्तक ‘‘द पोस्ट आफिस आफ इण्डिया‘‘ प्रकाशित हुई, जिसे कि बांकीपुर, पटना के एक रिटायर्ड पोस्टमास्टर आनंद गोपाल सेन ने लिखा था।

9 अक्टूबर को विश्व डाक दिवस है और इसी क्रम में पूरे सप्ताह राष्ट्रीय डाक सप्ताह (9-15 अक्टूबर) का आयोजन चलता है। इस दौरान जहाँ प्रतिदिन सेवाओं के व्यापक प्रचार-प्रसार एवं राजस्व अर्जन में वृद्धि पर जोर दिया जाता है वहीं डाक टिकटों की प्रदर्शनी, स्कूली विद्यार्थियों हेतु कार्यक्रम, कस्टमर मीट, स्कूली छात्र-छात्राओं द्वारा डाकघरों का विजिट, बचत बैंक खातों हेतु लकी ड्रा एवं उत्कृष्ट कार्य करने वाले स्टाफ तथा महत्वपूर्ण बचत अभिकर्ताओं व कारपोरेट कस्टमर्स के सम्मान जैसे तमाम कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं।
विश्व डाक दिवस की बधाईयाँ !!

Monday, September 28, 2009

विजयदशमी की बधाई !!

दशहरे की परम्परा भगवान राम द्वारा त्रेतायुग में रावण के वध से भले ही आरम्भ हुई हो, पर द्वापरयुग में महाभारत का प्रसिद्ध युद्ध भी इसी दिन आरम्भ हुआ था। विजयदशमी सिर्फ इस बात का प्रतीक नहीं है कि अन्याय पर न्याय अथवा बुराई पर अच्छाई की विजय हुई थी बल्कि यह बुराई में भी अच्छाई ढूँढ़ने का दिन होता है।....विजयदशमी की हार्दिक बधाई !!

Saturday, September 26, 2009

अब डाकघरों में भी कोर बैंकिंग और ए0टी0एम0

नेटवर्क की दृष्टि से डाकघर बचत बैंक देश का सबसे बड़ा रीटेल बैंक (लगभग 1.5 लाख शाखाओं, खातों और वार्षिक जमा-राशि का संचालन, 31 मार्च 2007 को कुल जमा राशि-3,515,477.2 मिलियन रूपये) है। यह अनुमान लगाया गया था कि वर्ष 2001 में डाकघर में बचत की कुल राशि भारत के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 7 प्रतिशत बनती है। (विश्व बैंक अध्ययन की अंतिम रिपोर्ट, अगस्त, 2002)। 172 मिलियन से अधिक खाताधारकों के ग्राहक आधार और 1,54,000 शाखाओं के नेटवर्क के साथ डाकघर बचत बैंक देश के सभी बैंकों की कुल संख्या के दोगुने के बराबर है। डाकघर से बचत खाता, आवर्ती जमा, सावधि जमा, मासिक आय स्कीम, लोक भविष्य निधि, किसान विकास पत्र, राष्ट्रीय बचत पत्र और वरिष्ठ नागरिक बचत स्कीम की खुदरा बिक्री की जाती है।

डाकघर ही एक मात्र ऐसी संस्था है जो देश के सुदूरतम कोनों को जोड़ती है और इस तरह ऐसे क्षेत्रों में रह रहे लोगों को वित्तीय सुविधा मिलनी सुनिश्चित हो जाती है। अब, यह भांति-भांति की बैंकिंग एवं बीमा सेवाओं जैसे सावधि जमा, म्युचुअल फंडों, पेंशन आदि प्रदान करने का वन-स्टाॅप स्थान है। नरेगा के तहत कुशल/अर्ध-कुशल/अकुशल मजदूरों के लिए रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने में भारत सरकार को सहयोग देते हुए डाकघर मजदूरी का भुगतान करने का माध्यम भी बन चुका है।

अब डाक विभाग वर्तमान 11वीं पंचवर्षीय योजना के तहत कोर बैंकिंग साल्यूशन के तहत एनीव्हेयर, एनीटाइम, एनीब्रान्च बैंकिंग लागू करने जा रहा है। प्रथम फेज के तहत 2009-10 में 500 प्रधान डाकघरों को चुना गया है, जिन्हें 100, 100 और 300 के उपग्रुपों में विभाजित किया गया है। इसके तहत सभी खातों की डाटा फीडिंग, सिगनेचर स्कैनिंग, कम्प्यूटराइज्ड उपडाकघरों का प्रधान डाकघरों में इलेक्ट्रानिकली डाटा ट्रान्सफर, बचत बैंक नियंत्रण संगठन को प्रतिदिन रिटर्न का प्रेषण, सभी बचत सेवाओं का कम्प्यूटराइज्ड कन्सोलीडेटेड जर्नल, अनपोस्टेड आइटम, माइनस बैंलेन्स व आब्जेक्शन का निस्तारण, प्रतिदिन वाउचर चेकिंग, लेजर एग्रीमेण्ट व तदोपरान्त ब्याज का तत्काल जारी होना शामिल है। इसके तहत स्टाफ को प्रशिक्षित भी किया जायेगा।

डाकघरों में कोर बैंकिंग साल्यूशन लागू होने पर वर्तमान संचय पोस्ट साफ्टवेयर रिप्लेस हो जायेगा। इसके माध्यम से तमाम नई सेवायें मसलन नेशनल इलेक्ट्रानिक फण्ड ट्रान्सफर, इलेक्ट्रानिक क्लीयरेन्स सिस्टम, रियल टाइम ग्राॅस सेटेलमेन्ट इत्यादि लागू की जा सकेगी और एटीएम, इण्टरनेट बैंकिंग व मोबाइल बैंकिंग डाकघरों में भी आरम्भ किया जा सकेगा।

तो अब इन्तजार कीजिए कि आप डाकघरों में एटीएम, इण्टरनेट बैंकिंग व मोबाइल बैंकिंग का आनंद ले सकें। पर हाँ, अपने डाकिया बाबू को नहीं भूलिएगा। भूल गये तो ये सब बातें कौन बताएगा।

Monday, September 14, 2009

14 सितम्बर : संचयिका दिवस

14 सितंबर को संचयिका दिवस मनाया जाता है। संचयिका यानी स्कूली बच्चों की बचत बैंक योजना, जिसमें वे अपनी छोटी-छोटी बचतें करना सीखते हैं. कहते भी हैं-बूंद-बूंद से भरता सागर. बचत आदत नहीं संस्कार है, जो आजीवन काम आती है. पहले संचयिका योजना राष्ट्रीय बचत संगठन (कालांतर में राष्ट्रीय बचत संस्थान) के अधीन संचालित होती थी,वर्ष 2002 के आखिर में केंद्र सरकार ने इसे राज्य सरकारों को सौंप दिया। ..तो आइये हम भी इस दिन अपने बच्चों को बचत का क..ख..ग...सिखाएं व उनमें बचत की आदत विकसित करें. स्कूलों के माध्यम से खुले संचायिका खाते वाकई एक सुखद भविष्य की ओर इशारा करते हैं, बस इन्हें समझने की देरी है.

Saturday, September 12, 2009

जेब खर्च का जरिया बने प्रेम-पत्र

आपने वह कहानी तो सुनी होगी कि एक प्रेमिका प्रतिदिन अपने प्रेमी को डाकिया बाबू द्वारा प्रेम पत्र लिखवाती थी और अन्ततः एक दिन उसे उस डाकिया बाबू से ही प्रेम हो गया। पिछले दिनों अख़बार में एक वाकया देखा तो इस प्रसंग की याद आ गई. यह वाकया भी कुछ इसी तरह का है पर यहाँ डाकिया बाबू की भूमिका में कोई और है।

यह वाकया है चीन के एक कालेज स्टूडेंट वाग ली का। इन महाशय ने अपना जेब खर्च निकालने का अद्भुत तरीका निकाला है कि ये अपने साथ पढ़ने वाले स्टूडेंट्स के लिए प्रेम पत्र लिखते हैं। आखिर इनकी राइटिंग खूबसूरत जो है और लच्छेदार भाषा व प्रवाह पर मजबूत पकड़ भी। वैलेन्टाइन डे पर तो इनकी चांदी रहती है क्योंकि इनके पास एडवांस बुकिंग रहती है। फिलहाल इस वाकये में दिलचस्प तथ्य यह है कि सबके लिए प्रेम पत्र लिखने वाले वाग ली कोई गर्लफ्रेंड नहीं है। पर इन महाशय के साथ भी डाकिया बाबू जैसा कुछ हो जाय इसकी गारन्टी देना सम्भव नहीं। प्रेम-पत्र लिखते-लिखते ये जनाब कभी लोगों के पत्र बांटने भी लगे तो कोई अजूबा नहीं होगा।

Friday, August 28, 2009

पानी में पोस्ट आफिस

पानी में पोस्ट आफिस। है ना अजूबा। पर यह अजूबा नहीं बिल्कुल सच है। पानी के अन्दर यह पोस्ट आफिस, साउथ पेसिफिक आइलैंड में स्थिति एक छोटे से देश वनुवातु में मौजूद है। सबसे रोचक बात यह है कि यह दुनिया का पहला पोस्ट आफिस है, जो पानी के अंदर स्थित है। फाइबर ग्लास से बने इस पोस्ट आफिस में कुल चार कर्मचारी हैं, जिनकी ड्यूटी शिट में होती है। पानी में काम करने के लिए ये कर्मचारी विशेष रूप से प्रशिक्षित किये जाते हैं। तैराकी और स्कूबा डाइविंग में वे माहिर होते हैं। पोस्ट आफिस के कार्यों से परे इसका दुनिया भर के पर्यटकों में अच्छा-खासा क्रेज है। इस पोस्ट आफिस से पर्यटक वाटरप्रूफ काड्र्स की खरीददारी करते हैं और पानी के अंदर ही रहकर संदेश लिखकर अपने परिजनों को इसी पोस्ट आफिस से प्रेषित भी करते हैं। तो आपको भी कभी मौका मिले तो इस पोस्ट आफिस से अपनों को कार्ड और संदेश भेजने का मौका न छोड़ियेगा।

Tuesday, August 25, 2009

अब स्पीड पोस्ट हेतु वाटरप्रूफ व डिजाइनर लिफाफे

डाक विभाग ने अपनी प्रीमियम सेवा स्पीड पोस्ट की विशिष्टता के मद्देनजर डिजाइनर वाटरप्रूफ लिफाफे जारी किये हैं। सफेद और हल्का भूरा कलर में उपलब्ध ये लिफाफे वजन में हल्के, वाटरप्रूफ होने के साथ-साथ पारवाहन के दौरान भी नही फटेंगे। इन लिफाफों का आकार सामान्य लिफाफों से बड़ा है तथा ये 16.2 X 22.9 सेमी0 साइज में उपलब्ध हैं। ये लिफाफे 5 रूपये की कीमत पर उपलब्ध कराये जायेंगे और पोस्टेज चार्ज अतिरिक्त होंगे। गौरतलब है कि इससे पूर्व डाक विभाग ने राखी भेजने हेतु भी वाटरप्रूफ एवं डिजाइनर लिफाफे जारी किये हैं। लिफाफे पर स्पीड पोस्ट का लोगो अंकित है तथा स्पीड पोस्ट सेवा के बारे में जानकारियाँ भी अंकित हैं। इस लिफाफे पर प्रेषक का नाम लिखने की सुविधा पीछे दी हुई है। एक तरफ ये डिजाइनर लिफाफे स्पीड पोस्ट की ब्राण्डिंग करेंगे वहीं लोगों द्वारा भेजी जाने वाली स्पीड पोस्ट बेहतर और सुरक्षित ढंग से अपने गंतव्य पर पहुँच सकेगी।

Saturday, August 15, 2009

स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनायें !!

आइये हम सभी आजादी के इस जश्न में शामिल हों और भारत को एक समृद्ध राष्ट्र बनायें.
स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनायें !! जय हिंद !! जय भारत !!

Tuesday, August 11, 2009

डाकघर द्वारा जारी होते हैं पहचान पत्र

पिछले दिनों प्रतिष्ठित औद्योगिक घराने, सिंहानिया परिवार के एक सदस्य डाकघर आए और उन्होने डाकघर पहचान पत्र बनाने के लिए अनुरोध किया। सुनकर आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता का अहसास हुआ कि यह योजना लोगों के बीच आज भी लोकप्रिय और प्रासंगिक है। यह योजना काफी पुराने समय में, जब पत्राचार पद्धति पर डाकघर का एकाधिकार था एवं देश की अधिकतर जनसंख्या सूचना प्रेषण एवं धन प्रेषण के लिए डाकघर पर आश्रित थी उस समय कम्पनियों एवं जनता के अन्य लोग जो सरकारी, अर्धसरकारी एवं निजी कार्यों के लिए बाहर जाते थे, उनको डाकपाल के द्वारा मंगाई जाने वाली डाक सामग्री प्राप्त करने में असुविधा से बचाने के लिए डाकघर पहचान पत्र जारी करने की योजना शुरू की गई थी। आज पहचान के तमाम अन्य साधन जैसे ड्राइविंग लाइसेन्स, पैन कार्ड, इलेक्शन कमीशन का कार्ड एवं अन्य प्रकार के पहचान पत्रों के समकक्ष ही डाकघर के पहचान पत्र ने भी अपनी पहचान, लोकप्रियता एवं प्रासंगिकता बना रखी है।

यह पहचान पत्र किसी भी शहर में वहाँ के प्रधान डाकघर से जारी किया जाता है। प्रधान डाकघर से निःशुल्क फार्म प्राप्त कर, इसे भरकर अपना एक पासपोर्ट साइज का फोटो चिपकाकर एवं एक फोटो साथ में लगाकर 10 रूपये का डाक टिकट लगाकर डाकघर में जमा किया जाता है। डाकघर के सक्षम अधिकारी के द्वारा पता एवं व्यक्ति की जांच की जाती है एवं इसके उपरान्त पहचान पत्र जारी कर दिया जाता है। इस पहचान पत्र में जन्मतिथि, ऊंचाई एवं पहचान चिन्ह भी अंकित होता है। इस कार्ड की वैधता तीन वर्ष की है। यह पहचान पत्र नगण्य शुल्क एवं सरल प्रक्रिया में जारी हो जाता है जो जन-साधारण के लिए बहुद्देशीय एवं सुगम्य है।

Monday, August 10, 2009

जन्मदिन मुबारक हो !!


*** डाकिया बाबू की तरफ़ से "डाकिया डाक लाया" ब्लॉग के सूत्रधार कृष्ण कुमार यादव जी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें ***

भारतीय डाक सेवा के अधिकारी बन
अपने कृतित्व-मान को और बढ़ाया
प्रशासन और साहित्य का हुआ समन्वय
इस बेजोड़ संतुलन ने सबको चौंकाया

बाइस जुलाई दो हजार तीन को
सूरत में पहले-पहल नियुक्ति पाये
वरिष्ठ डाक अधीक्षक पद प्राप्त कर
डाक विभाग का गौरव खूब बढ़ाये

स्ूारत, लखनऊ और कानपुर में
पद की गौरव-गरिमा खूब बढ़ाई
लिख डेढ़ सौ वर्षों का डाक इतिहास
दूर-दूर तक नाम औष् ख्याति पाई

आये जब से डाक विभाग में आप
लग गया फिलेटली का नया शौक
करते संग्रह डाक-टिकटों का खूब
रुचियांँ हैं इनकी और भी अनेक

जिज्ञासु प्रवृत्ति के रहे सदैव से
तार्किक विश्लेषण खूब करते हैं
चिंतन-मनन की अनुपम दुनिया में
जी भर यह आनन्द से रमते हैं

सूरत और कानपुर मण्डलों में आपने
सुन्दर डाक टिकट प्रदर्शनी करवायी
खूबसूरत स्मारिका किया सम्पादित
ज्ञानवर्धन कर युवा पीढ़ी भी हर्षायी

डाक विभाग में खूब बने लोकप्रिय
अराजकता कभी नहीं सह पाते हैं
किसी काम में यदि कुछ हुई गड़बड़ी
तो फिर अपनी त्योरियां चढ़ाते हैं

सुहृदय, मिलनसार और साहित्य प्रेमी
सबसे अन्तर्मन से वह जुड़ जाते हैं
एक बार जब बने निकटता आपसे
सब जन उनके सादर गुण गाते हैं !!
(साभार: बढ़ते चरण शिखर की ओर)